नियमित इलाज से रितिका ने दी टीबी को मात
– आत्मविश्वास से खाई दवा, एक्सडीआर से मिली निजात
– रोग के खिलाफ समुदाय में लोगों को कर रहीं जागरूक
(विश्व क्षय रोग दिवस (24 मार्च) पर विशेष)
बांदा। क्षय रोग यानि टीबी को हराने के लिए दो बातें सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण हैं। पहला समय से इलाज शुरू हो जाए और दवा का सेवन नियमित किया जाए। इससे अधिक गंभीर एमडीआर व एक्सडीआर टीबी ग्रसित मरीज भी पूरी तरह ठीक होकर सामान्य जीवन जी सकते हैं। कुछ ऐसा ही संदेश दे रही हैं छात्रा रितिका। शहर के आवास विकास कालोनी निवासी 24 वर्षीया रितिका (बदला हुआ नाम) भी एक्सडीआर टीबी से ग्रसित थीं, लेकिन नियमित दवाओं के सेवन से न सिर्फ उन्होंने खुद को पूरी तरह टीबी मुक्त कर लिया बल्कि समाज में इस रोग के खिलाफ मुहिम भी छेड़ रखी है।
रितिका बताती हैं कि वह वर्ष 2019 में भोपाल (मध्य प्रदेश) में रह कर इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रहीं थी। तभी उसे बुखार, खांसी व जुकाम हो गया। दवा खाने से बुखार ठीक हो गया, लेकिन जनवरी 2020 में अचानक से फिर बुखार आया। चिकित्सक ने सीने का एक्स-रे की जांच करवाई, लेकिन कुछ पता नहीं चल सका। बुखार, दवा और जाँच यह क्रम चलता रहा। घर आकर परिजनों को बताया, लेकिन लाकडाउन की वजह से सही इलाज नहीं मिल पाया। कुछ दिन बाद डाक्टर ने जांच के बाद उसे एक्सडीआर टीबी होने की पुष्टि की।
रितिका ने बताया कि एक्सडीआर का इलाज 18 माह से तीन साल तक होता है। डाक्टर की सलाह पर उसने दवा का सेवन शुरू कर दिया। दवा खाने में उसे कुछ दिक्कतें भी हुईं, जैसे उल्टी आना, गैस बनना, सिरदर्द, घबराहट, बेचौनी, सांस फूलना, बाल झड़ना व त्वचा आदि की समस्याएं आईं। इसके बावजूद दवा खाना बंद नहीं किया, जिसका नतीजा रहा कि उसका इलाज पूरा हो गया है। अब वह पूरी तरह से स्वस्थ्य हो गई है। वह लोगों को इसमें लारवाही न करने के बारे में जागरूक कर रही हैं।
जिला क्षय रोग अधिकारी डा. संजय कुमार शैवाल ने कहा कि थकान, बुखार, तीन या उससे ज्यादा हफ्तों से खांसी, खांसी में खून आना, खांसते या सांस लेते हुए सीने में दर्द होना, अचानक वजन घटना, ठंड लगना और सोते हुए पसीना आना इत्यादि टीबी के लक्षण होते हैं। इसका इलाज संभव है। सरकार की तरफ से इलाज बिल्कुल मुफ्त है। इसलिए टीबी के लक्षण दिखे तो संकोच नहीं करें। तत्काल अस्पताल आकर अपनी जांच करवाएं। जांच में अगर टीबी होने की पुष्टि होती है तो दवा लेकर तत्काल इलाज शुरू करवा लें। इससे जल्द स्वस्थ हो जाएंगे। इलाज में देरी करने पर यह खतरनाक हो सकता है। जनपद में टीबी के 1236 मरीज हैं। जिन्हें निक्षय पोषण योजना से 500 रूपए की हर माह प्रोत्साहन राशि दी जा रही है।  
इनसेट
बीमारी के चलते उठा पिता का साया
बांदा। रितिका बताती हैं कि उनके पिता 50 वर्षीय राजकुमार (परिवर्तित नाम) एक व्यवसायी थे। काफी समय से वह बीमार चल रहे थे। वर्ष 2016 में उनकी तबियत ज्यादा खराब हुई। घरवाले उन्हें अस्पताल ले गए। जहां जांच में टीबी की पुष्टि हुई। इसके बाद उनका इलाज शुरू हुआ। लेकिन तबियत में सुधार नहीं हुआ। मार्च 2017 में उनकी मृत्यु हो गई। पिता के मौत कुछ महीने बाद छोटे भाई आकाश (परिवर्तित नाम) की तबियत खराब हुई। जांच में डाक्टर ने टीबी बताई। बिना देर किए ही उसका इलाज शुरू करा दिया गया। वह अब पूरी तरह से ठीक है।

By Ravindra Mahan

Sub Editor UP TAAZA NEWS

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